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मातृ वन्दना

कविता:-

मातृदिवस ममतामयि केर वन्दन
नीज श्रद्धा अर्पित करथि सन्तान।
मातृ ऋणक प्रतिकार कोनों नञ
जगमे मायक महिमा अछि महान।१।

नित्य चरण वन्दन हे करुणामयि!
स्नेहसुधा पाओल तन-मन अपार।
करुणामयि!करुणा केर सागर छी
जननी छथि सृष्टि चक्रक आधार।२।

कोखि राखि एहि जगमे आनल
हिय क्षीरनिधि आहारक निर्माण।
सन्तति के नेह-स्नेह सS पोसल
आँचरमे सहजल सन्ततिक प्राण।३।

अप्पन सुख-सुविधा केर त्यागल
राखल सदिखन तनुजक ध्यान।
स्वयं नित भूखल-प्यासल रहितहुँ
सकल विभव सँ पोसलनि सन्तान।४।

पूत-कपूत एहि जगमे हम देखल
माता-कुमाता असम्भव व्यवहार।
जगत विदित मायक करुणा अछि
स्नेहक सागरमे स्नेहित ई संसार।५।

जे नर मायक ध्यान नञ राखथि
वएह कृतघ्न पामर कहबैत छथि।
अपनहि कर्मक परिणाम जगतमे
सगतरि जगमे दु:ख पबैत छथि।६।

मायक सेवा अछि सुख दायक
सब उन्नति केर ई अछि आधार।
देव सकल विहरै छथि ओहि घर
मायक जहि घर आदर-सत्कार।७।

क्लेश सकल हारिणि छथि जननी
सगर जगतमे सुख दायिनि छथि।
हुनकहि पर आश्रित अछि जीवन
सब सुख केर आगर माता छथि।८।

स्वत्व समर्पित अछि मातृ चरणमे
तन-मन सब न्योंछाबर छी कएने।
स्वर्ग सS सुखमय मायक आँचर
सब सुख पाएब आशीश पएने।९।
@अन्वेषक

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One comment

  1. Kamalkant Mishra

    ओना त मातृत्वक वर्णन में कतेको ग्रंथ कम पड़त मुदा अपनेक कविता में गागर मे सागर वाला कहावत चरितार्थ लागि रहल अछि | अति सुन्दर शब्द में व्यक्त छल |

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