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कलियुगक प्रभाव

कलियुगक प्रभाव

कलियुग सगतरि पैSर पसारल
स्वरुप युगके बदलि रहल अछि।
कलुषित बनल मनुष्यक जीवन
लोक धर्मके बिसरि चुकल अछि।।१।।
देलनि परिक्षित जे स्थान बासके
स्वर्ण मदिरा ओ परस्त्री गमनमे।
देखि रहल छी ओकर फला-फल
चारिम अछि जुआ उँच भवनमे।।२।।
धनके ईच्छा सबसँ अछि बलगर
सम्मानित अछि मदिरा ओहिमे।
अर्ध वसनमे नारिक आकर्षण
जुआघर पसरल जे पग-पगमे।।३।।
राग-द्वेष जगभरि अछि पसरल
मनुष्यक रुप बदलि रहल अछि।
त्याग-अहिंसा न्यायक आशामे
जीवितो लोक मृत बनल अछि।।४।।
अपनहि सहोदर के रक्त पिपाशा
चाहि रहल एक-दोसर केर प्राण।
स्वार्थक खातिर धर-धरमे देखल
प्राणक प्यासल अपनहि सन्तान।।५।।
अत्याचारी जे अछि एहि जगमे।
ओ उच्चासन चढ़ि बजबय गाल।
नीक लोक सब मौन बनल अछि
भ्रष्टाचारी सगतरि ठोकय ताल।।६।।
अस्त-व्यस्त जीवन अछि सबहक
अपटी खेतमे लटकल अछि प्राण।
पूर्वज रचित जे कुल परम्परा छल
तोड़ि रहल छथि सबहक सन्तान।७।।
नीति-अनितिक माँझ फँसल अछि
अन्याय सगतरि बलगर अछि भेल।
लोभ-मोह-राग-द्वेष अछि पसरल
रीति-कुरीतिमे परिवर्तित भगेल।।८।।
सकल मनुज अस्त-व्यस्त जगमे
इएह संसारक रीति बनल अछि।
क्यो नञ ककरो मानि रहल अछि
नाँगट जे बनल सबसँ होशियार।।९।।
चोर-उच्चक्का सम्मानित अछि
जगमे ज्ञानी-ध्यानी छथि लाचार।
युगधारामे भसिआएल छथि सब
छोड़लनि सबजन नीक विचार।।१०।।
सौमनस्य बदलि गेल बैमनस्यमे
नैतिकता नञ ककरो रहि गेल।
मातल अछि सब अपना-अपनी
तखन जीबैत छी ककरालेल।।११।।
जन्म मनुष्यक व्यर्थ बनल अछि
आवश्यक अछि क्षणिक विश्राम।
सृष्टिचक्र गतिमान अछि सदिखन
चाहि रहल अछि अल्प-विराम।।१२।।
युगधर्मक अविरल प्रवाहक बीच
भसिआएल छै सबहक सदाचार।
दुराचार भेल युगधर्मक दिग्दर्शक
देखल कलियुग प्रेरित व्यवहार।।१३।।
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