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अधूरा स्वप्न

कविता

काल वेगसँ चलय निरन्तर
हमहूँ सँगमे गमन करै छी।
मन्द-मन्द गति चलैत जीवन
किछु मनोरथ कहि रहल छी।।१।।

बाँकी अछि किछु कर्ज चुकाएब
किछु फर्ज निभाएब अछि बाँकी।
व्यथा मेटाएब आवश्यक किछु
किछु प्रथा चलाएब अछि बाँकी।।२।।

निर्गत अछि जीवन निरन्तर
किछु रुसल किछु पाछू छूटल।
सम्बन्ध किछु बनि गेल जगमे
जुड़ि गेल किछु जुड़लो टूटल।।३।।

रुसल के बाँकी अछि मनाएब
कानल के हँसाएब बाँकी अछि।
टूटल-फूटल सम्बन्ध जोड़ब
किछु दर्द मेटाएब बाँकी अछि।।४।।

किछु स्वप्न अधूरा अछि एखनो
किछु काज जरुरी अछि बाँचल।
जीवन एकटा बनल पहेली
पूरा सुलझाएब अछि बाँचल।।५।।

गमन जखन शास्वत जगसँ
लाभ-हानिमे किछु नञ अन्तर।
चंचल मन व्यापित जग लीला
मायामे भागि रहल निरन्तर।।६।।

किछु बात बताएब अछि बाँकी
आदि-अन्तके सब कथा पिहानी।
ब्रह्म सत्य ओ जगन्मिथ्या मानल
ई अछि संसारक राम कहानी।।७।।

-अन्वेषक

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